स्थान: नई दिल्ली
दिनांक: 11 जुलाई, 2026
विशेष संवाददाता, नई दिल्ली:
भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कार्यसमिति (Working Committee) की एक मुस्लिम सदस्य द्वारा दिए गए हालिया बयान ने देश के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का नया केंद्र बना दिया है। पार्टी की वरिष्ठ सदस्या ने न केवल खुलकर अपनी ‘हनुमान भक्ति’ स्वीकार की है, बल्कि यह भी कहा है कि वे अब फोन पर बातचीत की शुरुआत भी ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ करती हैं।
उनका मानना है कि भगवान राम और हनुमान भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं और उनसे किसी भी समुदाय को परहेज या एतराज नहीं होना चाहिए।
“हनुमान भक्ति मेरी आस्था, जय श्री राम एक राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक”
पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रिय भूमिका निभाने वाली इस मुस्लिम नेत्री ने एक अनौपचारिक चर्चा के दौरान कहा कि वे लंबे समय से संकटमोचन हनुमान की अनन्य भक्त रही हैं और यह उनकी पूरी तरह से व्यक्तिगत आस्था है।
मुस्लिम समाज के लिए संदेश:
उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं एक गौरवान्वित भारतीय मुसलमान हूं और मुझे अपनी आस्था और संस्कृति पर पूरा गर्व है। ‘जय श्री राम’ केवल एक धार्मिक नारा नहीं, बल्कि भारत की पहचान और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। इसे किसी संकीर्ण चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। मेरे लिए यह शांति और सद्भाव का संबोधन है।”
उन्होंने आगे कहा कि जब भी वे किसी से फोन पर बात करती हैं, तो ‘जय श्री राम’ कहकर अभिवादन करना उन्हें मानसिक शांति और सकारात्मकता देता है। उनके अनुसार, देश के विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए हमें अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार करना होगा।
सियासी गलियारों में हलचल, पार्टी की मिली-जुली प्रतिक्रिया
भाजपा की वर्किंग कमेटी की सदस्या का यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के एजेंडे को लेकर अल्पसंख्यक समुदायों तक अपनी पहुंच और गहरी कर रही है।
- पार्टी की रणनीति: भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यह एक व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद और आस्था है, जिसका पार्टी सम्मान करती है। पार्टी का मानना है कि राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति यह जुड़ाव देश की एकता को मजबूत करता है।
- विपक्ष की नजर: दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इस पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह भाजपा के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के एजेंडे का हिस्सा है, जिसे पार्टी अपने अल्पसंख्यक मोर्चा के माध्यम से आगे बढ़ा रही है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘जय श्री राम’ का विवाद
यह पहली बार नहीं है जब ‘जय श्री राम’ का नारा चर्चा में रहा है। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह नारा हमेशा से ही केंद्र में रहा है। 1990 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान यह नारा एक व्यापक जन-आंदोलन का आधार बना था। समय के साथ-साथ यह नारा अब भारत की साझा पहचान और ‘भारतीयता’ का प्रतीक माना जाने लगा है। भाजपा का मानना है कि राम भारत की संस्कृति की आत्मा हैं और राम का नाम लेना किसी के लिए भी वर्जित नहीं होना चाहिए।
उनकी इस टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर भी एक बड़ी बहस छेड़ दी है, जहां लोग इसे ‘भारत की बदलती सामाजिक-राजनैतिक तस्वीर’ के रूप में देख रहे हैं। भाजपा नेत्री का यह कदम इस बात का प्रमाण है कि भारत में व्यक्तिगत आस्था और राष्ट्रीय पहचान का समन्वय कैसे नए आयाम गढ़ रहा है।
