सनातन परंपराओं पर तकरार: जगन्नाथ पुरी के राजा ने राष्ट्रपति और पीएम को लिखा पत्र; विदेशों में ISKCON द्वारा मनमर्जी की तारीखों पर रथयात्रा निकालने को बताया शास्त्रों के विरुद्ध

स्थान: पुरी (ओडिशा)

दिनांक: 10 जुलाई, 2026

धार्मिक ब्यूरो, पुरी:

विश्व प्रसिद्ध 12वीं सदी के श्री जगन्नाथ मंदिर की सदियों पुरानी परंपराओं और शास्त्रों की पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव (Gajapati Maharaja Dibyasingha Deb) ने एक बड़ा और कड़ा कदम उठाया है। इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) द्वारा निर्धारित धार्मिक कैलेंडर से हटकर मनमर्जी की तारीखों पर ‘ऑफ-सीजन’ रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने के खिलाफ गजपति महाराज ने देश के सर्वोच्च नेतृत्व का दरवाजा खटखटाया है।

श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष और महाप्रभु के आद्य सेवक (प्रथम सेवक) गजपति महाराज ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Droupadi Murmu) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को अलग-अलग पत्र लिखकर केंद्र सरकार से इस गंभीर विषय पर तुरंत हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस्कॉन द्वारा सनातन शास्त्रों और पुरी श्रीमंदिर के पंचांग की अनदेखी करके विदेशों में किसी भी तारीख को रथयात्रा निकालना पूरी तरह अनैतिक है और इससे दुनिया भर के करोड़ों जगन्नाथ भक्तों की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं।

विवाद की जड़: शास्त्रों के नियमों को दरकिनार कर ‘जब मर्जी, तब रथयात्रा’

गजपति महाराज ने अपने पत्रों में स्कंद पुराण सहित विभिन्न सनातन धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए इस बात को रेखांकित किया कि भगवान जगन्नाथ के उत्सवों की तिथियां स्वयं शास्त्रों द्वारा निर्धारित की गई हैं:

  • शास्त्रों का विधान: सनातन परंपरा के अनुसार, महाप्रभु की स्नान यात्रा केवल ज्येष्ठ पूर्णिमा को और नौ दिवसीय रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को ही मनाई जा सकती है।
  • इस्कॉन का उल्लंघन: इस्कॉन संगठन भारत में तो परंपरा का पालन करने के लिए राजी हो गया है, लेकिन विदेशों (जैसे अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों) में वे स्थानीय प्रशासनिक अनुमतियों और छुट्टियों की सहूलियत के आधार पर साल के 12 महीनों में कभी भी ‘रथयात्रा’ का आयोजन कर देते हैं। इस वर्ष भी वैश्विक स्तर पर लगभग 80 ‘ऑफ-कैंलेंडर’ रथयात्राएं आयोजित करने की रूपरेखा तैयार की गई है, जो मूल जगन्नाथ संस्कृति के मूल सिद्धांतों को नष्ट कर रही है।

शंकराचार्य और मुक्तिमंडप का समर्थन; इस्कॉन ने बातचीत से पीछे हटने का दिया संकेत

इस संवेदनशील मुद्दे पर पुरी के गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और पुरी मंदिर की सर्वोच्च विद्वत सभा ‘मुक्तिमंडप पंडित सभा’ ने भी गजपति महाराज के रुख का पूर्ण समर्थन किया है।

इस्कॉन का रुख और तल्खी:

गजपति महाराज ने बताया कि उन्होंने 4 जुलाई को इस्कॉन की गवर्निंग बॉडी कमीशन (GBC) के चेयरमैन मधुसेविता दास प्रभु को भी पत्र लिखकर अपनी गंभीर चिंताएं साझा की थीं। इसके जवाब में 7 जुलाई को इस्कॉन के कोलकाता मुख्यालय से आए पत्र में संगठन ने इस अपील को खारिज कर दिया। इस्कॉन ने विदेशों में व्यवस्थागत दिक्कतों और भक्तों के अल्पसंख्यक होने का तर्क देते हुए कहा कि वे इस चर्चा से हमेशा के लिए पीछे हटते हैं (Bow out of the discussion) और विदेशों में उनके पूर्व निर्धारित कार्यक्रम जारी रहेंगे।

जगन्नाथ पुरी मंदिर प्रशासन और इस्कॉन के बीच विवाद का वर्तमान विवरण

पक्ष / संगठनवर्तमान आधिकारिक रुखप्रस्तावित कदम / मांग
गजपति महाराज व पुरी मंदिर प्रशासनशास्त्रों के नियमों का वैश्विक स्तर पर 100% पालन हो; पंचांग से छेड़छाड़ सनातन संस्कृति का अपमान है।राष्ट्रपति और पीएम से सीधा हस्तक्षेप की मांग; केंद्रीय संस्कृति और विदेश मंत्रालय के जरिए दबाव बनाने की रणनीति।
इस्कॉन (ISKCON GBC)भारत के भीतर पुरी कैलेंडर मानेंगे, लेकिन विदेशों में व्यावहारिक और प्रशासनिक कारणों से तिथियां बदलना मजबूरी है।मामले को आगे बढ़ाने से इनकार; विदेशी केंद्रों पर अपनी वर्तमान व्यवस्था को यथावत रखेंगे।

गजपति महाराज ने अपने पत्रों में राष्ट्रपति मुर्मू से व्यक्तिगत मुलाकात का समय भी मांगा है, ताकि मंदिर प्रबंध समिति का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली जाकर उन्हें इस सांस्कृतिक संकट से पूरी तरह अवगत करा सके। उन्होंने विदेशों में रहने वाले ओडिया समुदाय (Odia Diaspora) के उन प्रवासियों की भी सराहना की, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्कॉन के इन अनधिकृत आयोजनों के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे हैं। संतों का मानना है कि यदि केंद्र सरकार ने इस मामले में कूटनीतिक स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह वैश्विक स्तर पर सनातन धर्म की मूल पहचान को भ्रमित कर सकता है।

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