चंडीगढ़ से दिल्ली तक सियासी भूचाल: पंजाब कांग्रेस में बगावत तेज, टूट की कगार पर पार्टी; प्रदेश प्रभारी बघेल के साथ सांसद गुट की बैठक टली; चन्नी और रंधावा की 2 शर्तों ने फंसाया पेंच, राहुल गांधी से मिलकर लेंगे अंतिम फैसला

स्थान: चंडीगढ़ / नई दिल्ली

दिनांक: 10 जुलाई, 2026

विशेष ब्यूरो, चंडीगढ़:

2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) से ठीक पहले पंजाब कांग्रेस (Punjab Congress) के भीतर सुलग रही आंतरिक कलह ने अब एक गंभीर और आत्मघाती विद्रोह का रूप ले लिया है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) द्वारा हाल ही में किए गए सांगठनिक फेरबदल के बाद से शुरू हुआ बवाल इस कदर बढ़ गया है कि पार्टी दो फाड़ होने (Split) की कगार पर पहुंच गई है।

असंतोष को दबाने और डैमेज कंट्रोल (Damage Control) के लिए चंडीगढ़ पहुंचे पंजाब कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी भूपेश बघेल (Bhupesh Baghel) के साथ होने वाली असंतुष्ट सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के गुट की महत्वपूर्ण बैठक गुरुवार रात आखिरी पलों में टल गई। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) और गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा (Sukhjinder Singh Randhawa) के नेतृत्व वाले इस बागी गुट ने साफ कर दिया है कि वे अब पंजाब के किसी भी स्थानीय नेता या प्रभारी से बात नहीं करेंगे। यह गुट आज (10 जुलाई) दिल्ली में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) से मुलाकात कर आर-पार का फैसला लेने की तैयारी में है।

वह 2 शर्तें जिन पर अड़ा चन्नी-रंधावा गुट; हाईकमान ने दिखाई सख्त आंख

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर हुई ‘शक्ति प्रदर्शन’ (Show of Strength) की बैठक के बाद बागी धड़े ने आलाकमान के सामने दो बेहद सख्त शर्तें रखी थीं, जिसके कारण बात पूरी तरह बिगड़ गई:

  • शर्त 1 – प्रदेश अध्यक्ष पद से राजा वड़िंग की विदाई: चन्नी गुट की पहली और सबसे बड़ी मांग है कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग (Amrinder Singh Raja Warring) को तत्काल प्रभाव से पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PPCC) के अध्यक्ष पद से हटाया जाए और कमान चन्नी को सौंपी जाए।
  • शर्त 2 – चुनावी कमेटियों का पुनर्गठन: बागी गुट का आरोप है कि हाल ही में घोषित चुनावी कमेटियों में वरिष्ठ सांसद मनीष तिवारी (Manish Tewari) सहित कई कद्दावर चेहरों को दरकिनार किया गया है, इसलिए इन कमेटियों को दोबारा बदला जाए।

हालांकि, चंडीगढ़ में पत्रकारों से बात करते हुए राज्य प्रभारी भूपेश बघेल ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कह दिया, “पार्टी हाईकमान ने जो निर्णय ले लिया है, उसमें अब कोई बदलाव नहीं होगा। राजा वड़िंग ही प्रदेश अध्यक्ष बने रहेंगे। नेतृत्व परिवर्तन का कोई सवाल ही नहीं उठता।” प्रभारी के इस दोटूक बयान ने आग में घी का काम किया, जिसके बाद बागी गुट ने बैठक का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया।

अमित शाह से रंधावा की मुलाकात और मनीष तिवारी के ट्वीट ने बढ़ाई धड़कनें

पंजाब कांग्रेस के इस हाई-प्रोफाइल ड्रामे में उस समय सस्पेंस और गहरा गया जब गुरदासपुर के वरिष्ठ कांग्रेस सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से मुलाकात की।

राजनैतिक कयासों का बाजार गर्म:

हालांकि रंधावा ने इस मुलाकात को पंजाब की कानून-व्यवस्था और नार्को-आतंकवाद (Narco-terrorism) पर केंद्रित एक औपचारिक बैठक बताया, लेकिन कांग्रेस के भीतर इसे आलाकमान पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी ओर, कमेटियों से बाहर किए गए वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने सोशल मीडिया पर अपनी ही पार्टी पर तंज कसते हुए लिखा कि उनके पास “व्यक्तिगत और संस्थागत असुरक्षाओं का कोई इलाज (Antidote) नहीं है।”

पंजाब कांग्रेस के भीतर उभरे नए धड़ों का तुलनात्मक समीकरण

राजनैतिक धड़ा (Faction)मुख्य नेतृत्वकर्तावर्तमान रुख और मांगें
बागी / असंतुष्ट गुटचरणजीत चन्नी, सुखजिंदर रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा, मनीष तिवारी (परोक्ष रूप से)।राजा वड़िंग को अध्यक्ष पद से हटाएं; संगठन में दलित और अनुभवी चेहरों को वास्तविक कमान मिले।
आधिकारिक / संस्थागत गुटअमरिंदर सिंह राजा वड़िंग (PPCC अध्यक्ष), सुखपाल सिंह खैरा।आलाकमान का फैसला सर्वोपरि; 2027 चुनाव के लिए सभी नेता एक मंच पर आएं, कोई बगावत नहीं है।
केंद्रीय हाईकमान (AICC)भूपेश बघेल (प्रभारी), अजय माकन (ऑब्जर्वर)।अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं होगी; सांगठनिक सूचियों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आज दिल्ली में राहुल गांधी के साथ होने वाली बैठक में चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर रंधावा की चिंताओं का ठोस समाधान नहीं निकाला गया, तो पंजाब कांग्रेस में एक बड़ा संगठनात्मक विस्फोट हो सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ के पार्टी छोड़ने के बाद पैदा हुए संकट से उबरने की कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से ठीक आठ महीने पहले यह आंतरिक विद्रोह बेहद घातक साबित हो सकता है, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) या भाजपा को मिल सकता है।

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