स्थान: नई दिल्ली
दिनांक: 3 जुलाई, 2026
कानूनी संवाददाता, नई दिल्ली:
देश की न्यायिक व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते और अनियंत्रित उपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अदालती कार्यवाहियों और फैसलों में AI द्वारा तैयार किए गए मनगढ़ंत, फर्जी और गैर-मौजूद कानूनी उदाहरणों (AI Hallucinations) के इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने इसे न्याय की आत्मा को दूषित करने वाला बताते हुए ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाने की घोषणा की है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इस मामले की गंभीरता की तुलना 1984 की भयानक भोपाल गैस त्रासदी से करते हुए कहा:
“अदालती फैसलों में AI जनित फर्जी और काल्पनिक सामग्री या उदाहरणों का उपयोग करना कानून और न्याय के क्षेत्र में ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ (Methyl Isocyanate) गैस को छोड़ने जैसा है। यह अदृश्य है, बेहद चालाकी से प्रवेश करता है और जब तक कोई इसे नोटिस करता है, तब तक यह विनाशकारी साबित हो चुका होता है। यह न केवल न्याय की धारा को दूषित करता है, बल्कि न्यायिक निर्णय की मूल आत्मा को ही छीन लेता है।”
NCLT और NCLAT के फैसले रद्द; जेएंडके बैंक और एसेल इन्फ्रा का था मामला
सर्वोच्च न्यायालय का यह कड़ा रुख पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड व अन्य के मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। यह मामला एसेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स (Essel Infraprojects) की ₹200 करोड़ की क्रेडिट फैसिलिटी से जुड़ी दिवाला प्रक्रिया (Insolvency Proceedings) से संबंधित था।
- काल्पनिक फैसलों के आधार पर दिया निर्णय: नेशनल कंपनी Law ट्रिब्यूनल (NCLT) की मुंबई पीठ ने अगस्त 2024 में ₹87.43 करोड़ के डिफॉल्ट के आधार पर दिवाला याचिका स्वीकार की थी, जिसे बाद में अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने भी सही ठहराया था।
- सुप्रीम कोर्ट की जांच में खुली पोल: जब अपील सुप्रीम कोर्ट पहुंची, तो वरिष्ठ वकील ने पीठ को बताया कि ट्रिब्यूनल ने जिन फैसलों को नजीर (Precedent) मानकर अपना फैसला सुनाया है, वे कानूनी इतिहास में कहीं अस्तित्व में ही नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब स्वतंत्र जांच की, तो पाया कि कई मामलों के शीर्षक फर्जी थे और कुछ असली मामलों में AI टूल्स द्वारा मनगढ़ंत पैराग्राफ जोड़ दिए गए थे।
- खुद ट्रिब्यूनल ने की ‘रिसर्च’: चौंकाने वाली बात यह रही कि कर्जदाता बैंक ने हलफनामा देकर साफ किया कि उनके वकीलों ने कोर्ट में ये मामले पेश नहीं किए थे, बल्कि ट्रिब्यूनल ने अपने स्तर पर ‘रिसर्च’ के लिए AI टूल का सहारा लिया और झांसे में आ गया। अदालत ने इसे कानून के शासन का उल्लंघन मानते हुए NCLT और NCLAT दोनों के फैसलों को पूरी तरह रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से मेरिट पर सुनने के लिए वापस भेज दिया।
बिना वेरिफिकेशन केस पेश करना वकीलों की ‘कदाचार’ और जजों की ‘गंभीर चूक’
अदालत ने स्पष्ट किया कि वे न्याय में तकनीक के इस्तेमाल के खिलाफ नहीं हैं, और हाल ही में ‘ड्रॉफ्ट सुप्रीम कोर्ट रूल्स फॉर यूज़ ऑफ AI, 2026’ भी जारी किया गया है। लेकिन बिना जांच-परख (Human-in-the-loop) के आंख मूंदकर मशीनों पर भरोसा करना आत्मघाती है।
- वकीलों के लिए निर्देश: यदि कोई अधिवक्ता बिना सत्यापन (Verification) के AI से जनित किसी केस का हवाला कोर्ट में देता है, तो उसे गंभीर व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) माना जाएगा।
- जजों के लिए चेतावनी: यदि कोई जज या न्यायिक प्राधिकारी ऐसे काल्पनिक तर्कों के आधार पर फैसला लिखता है, तो यह उसके कर्तव्य में एक बेहद गंभीर चूक मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि किसी फैसले में एक तिनका (iota) भी फर्जी सामग्री का आ जाता है, तो कानून की नजर में वह फैसला अमान्य हो जाता है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को कमेटी बनाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने देश में वकीलों की सर्वोच्च संस्था बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को तत्काल एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह कमेटी अदालतों में AI के उपयोग, वकीलों द्वारा फर्जी दस्तावेज या नजीरें पेश करने की आदतों पर लगाम लगाने के लिए विस्तृत मार्गदर्शिका (Guiding Principles) तैयार करेगी। साथ ही, नियमों का उल्लंघन करने वाले वकीलों के खिलाफ क्या अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई की जाए, इसकी रूपरेखा भी तय करेगी।
पीठ ने अंत में कहा कि सोचने, समझने, सही-गलत और न्याय-अन्याय का अंतर करने की क्षमता इंसानी दिमाग के व्यवस्थित प्रशिक्षण से आती है, इसे किसी मशीन को सौंपकर इंसान अपने अस्तित्व के मूल तत्व को नहीं छोड़ सकता।
