सिंधु जल संधि पर भारत के कड़े रुख से घबराया पाकिस्तान: बौखलाए पाकिस्तानी मंत्रियों ने उगला जहर, बोले— ‘पानी पर हाथ डाला तो हाथ काट देंगे’; भारत ने साफ कहा— आतंकवाद और पानी एक साथ नहीं बह सकते

स्थान: इस्लामाबाद/नई दिल्ली

दिनांक: 30 जून, 2026

अंतरराष्ट्रीय डेस्क:

पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) को अस्थायी रूप से निलंबित (Abeyance) किए जाने से पाकिस्तान में खलबली मच गई है। पानी की भारी किल्लत और आर्थिक मोर्चे पर घिरे पाकिस्तान के मंत्रियों ने अब भारत को सीधे तौर पर गीदड़भभकी देना शुरू कर दिया है।

इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पाकिस्तान के जलवायु परिवर्तन मंत्री मुसादिक मलिक और सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भारत के खिलाफ जमकर जहर उगला। मुसादिक मलिक ने बेहद तीखे और भड़काऊ लहजे में कहा, “एक पड़ोसी देश (भारत) के प्रधानमंत्री के हाथ में पानी के नल का कंट्रोल है और वे कहते हैं कि पाकिस्तान में पानी की एक बूंद नहीं आने देंगे। हम साफ कर देना चाहते हैं कि जो कोई भी हमारे पानी पर हाथ डालेगा, हम वो हाथ काट देंगे।”

“सिंधु जल संधि अब भी लागू, भारत एकतरफा खत्म नहीं कर सकता”

पाकिस्तानी सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र से गुहार लगाते हुए दावा किया कि 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई इस संधि को भारत अपनी मर्जी से एकतरफा रद्द या संशोधित नहीं कर सकता।

  • पाकिस्तान का कानूनी नैरेटिव: तरार ने कहा, “यह संधि आज भी कानूनी रूप से लागू है। हमारे देश की 24 करोड़ आबादी और 50 फीसदी से अधिक रोजगार कृषि (सिंधु नदी तंत्र) पर निर्भर है। पानी हमारी ‘रेड लाइन’ है और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हमारे अधिकारों को कोई नहीं छीन सकता।”
  • इस्लामाबाद में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार: पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर वैश्विक समर्थन जुटाने के लिए इस्लामाबाद में एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का भी आयोजन किया है, जिसमें दुनिया भर के जल और कानूनी विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है ताकि भारत के फैसले के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव तैयार किया जा सके।
  • युद्ध की धमकी: इससे पहले पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी एआरवाई न्यूज से बात करते हुए कहा था कि यदि भारत ने नदियों के बहाव को रोकने के लिए अपनी परियोजनाओं की रफ्तार बढ़ाई, तो पाकिस्तान भारत के खिलाफ युद्ध (War) की शुरुआत करने से भी पीछे नहीं हटेगा।

भारत का दोटूक रुख: ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’

पाकिस्तान की इन धमकियों पर भारत ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच से बेहद सख्त और स्पष्ट जवाब दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में भारत की प्रथम सचिव अनुपमा सिंह और यूएन इवेंट में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने पाकिस्तान के दोहरे रवैये को बेनकाब किया।

भारतीय राजनयिकों का करारा जवाब:

भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जिम्मेदारी एकतरफा नहीं हो सकती। जो देश राज्य प्रायोजित आतंकवाद (State-Sponsored Terrorism) को अपनी सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करता है, वह किसी सहयोगी संधि के फायदों की उम्मीद कैसे कर सकता है? आतंकवाद का वैश्विक केंद्र बन चुका पाकिस्तान मानवाधिकारों और संधियों की दुहाई देने से पहले इंसानी जिंदगियों का सम्मान करना सीखे।”

पहलगाम हमले के बाद भारत ने उठाया था बड़ा कदम

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पिछले साल जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 26 पर्यटकों और नागरिकों की जान चली गई थी। इस कायराना हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा फैसला लेते हुए 65 साल पुरानी ‘सिंधु जल संधि 1960’ को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया था।

सिंधु जल संधि (1960) का गणितआवंटन और वर्तमान स्थिति
तीन पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलज)पूरी तरह भारत के अधिकार क्षेत्र में।
तीन पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब)पानी का मुख्य हिस्सा पाकिस्तान को, लेकिन भारत को पनबिजली और सिंचाई प्रोजेक्ट बनाने का अधिकार।
भारत का नया रुखजब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर पूरी तरह और विश्वसनीय रोक नहीं लगाता, तब तक संधि निलंबित रहेगी और भारत अपने हिस्से के जल का अधिकतम उपयोग जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विकास के लिए करेगा।

जल संसाधन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय जल मंत्री सीआर पाटिल के निर्देश पर भारत पश्चिमी नदियों पर अपनी हाइड्रोपावर परियोजनाओं और नदी-जोड़ो अभियान (River-Linking Projects) को तेज गति से आगे बढ़ा रहा है, जिससे पाकिस्तान के सिंध और बलूचिस्तान प्रांतों में पानी का संकट गहरा गया है और वहां आंतरिक हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि सीमा पार आतंकवाद पर लगाम कसे बिना पाकिस्तान को पानी के मोर्चे पर कोई राहत नहीं मिलने वाली है।

सिंधु जल संधि विवाद पर भारत-पाकिस्तान की कूटनीतिक बैठकों, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में चल रही बहस और जम्मू-कश्मीर की जल परियोजनाओं

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