स्थान: भोपाल
दिनांक: 27 जून, 2026
विशेष संवाददाता, भोपाल:
मध्य प्रदेश में उच्च शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर एक बेहद हैरान और विचलित करने वाला मामला सामने आया है, जिसने देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूबे में सुपर-स्पेशलिस्ट (एमडी और एमएस) डॉक्टर्स को भी रोजगार न मिलने के कारण दर-दर भटकना पड़ रहा है।
हालत यह हो चुकी है कि राज्य के विभिन्न सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों से पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) कर चुके 86 विशेषज्ञ डॉक्टरों की एमबीबीएस (MBBS) की मूल डिग्रियां ‘बंधक’ पड़ी हैं। डिग्रियां न होने के कारण वे न तो कहीं प्रैक्टिस कर पा रहे हैं और न ही अपना एजुकेशन लोन चुका पा रहे हैं। इस गंभीर मामले में अब प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने सीधे संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग के शीर्ष अफसरों से पूरे मामले पर तथ्यात्मक रिपोर्ट और जवाब तलब किया है।
अनिवार्य ‘रूरल बॉन्ड’ बना गले की फांस: जानिए क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा संकट मध्य प्रदेश सरकार की कड़े ‘ग्रामीण सेवा बॉन्ड’ (Rural Service Bond) नीति के कारण उपजा है।
- नियम क्या है?: मध्य प्रदेश में सरकारी कोटे से एमबीबीएस या एमडी/एमएस करने वाले डॉक्टरों को पढ़ाई पूरी होने के बाद अनिवार्य रूप से 1 से 3 साल तक ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों में सेवाएं देनी होती हैं। ऐसा न करने पर डॉक्टरों को भारी जुर्माना (बॉन्ड राशि) चुकाना पड़ता है।
- अधिकारियों की लापरवाही: डॉक्टरों का आरोप है कि पढ़ाई पूरी होने के महीनों बाद भी स्वास्थ्य विभाग ने इन 86 विशेषज्ञ डॉक्टरों को ग्रामीण क्षेत्रों या मेडिकल कॉलेजों में खाली पदों पर नियुक्ति (Postings) ही नहीं दी।
- डिग्रियां अटकीं: नियम के मुताबिक, जब तक डॉक्टर अपना बॉन्ड पीरियड पूरा नहीं कर लेते या बॉन्ड की करोड़ों रुपये की राशि जमा नहीं कर देते, तब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग उनकी मूल एमबीबीएस डिग्री और पीजी पासिंग सर्टिफिकेट जारी नहीं करता। अधिकारियों की सुस्ती के चलते ये डॉक्टर्स तकनीकी रूप से ‘बंधक’ बनकर रह गए हैं।
एजुकेशन लोन बना जी का जंजाल; बैंक भेज रहे कुड़की के नोटिस
डिग्रियां न मिलने के कारण इन उच्च शिक्षित डॉक्टरों के सामने अब जीवन-यापन और आर्थिक अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।
बैंकों की प्रताड़ना:
इनमें से अधिकांश डॉक्टरों ने लाखों रुपये का ‘एजुकेशन लोन’ लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की थी। चूंकि उनके पास कोई वैध नौकरी या प्रैक्टिस करने के लिए मूल डिग्री नहीं है, इसलिए वे पिछले कई महीनों से लोन की मासिक किस्त (EMI) नहीं चुका पा रहे हैं। बैंकों ने अब इन डॉक्टरों और उनके माता-पिता को ‘डिफॉल्टर’ घोषित करते हुए कानूनी कार्रवाई और संपत्तियों की कुड़की के नोटिस भेजना शुरू कर दिया है।
पीड़ित डॉक्टरों ने भावुक होकर बताया, “हमने 10 साल तक दिन-रात पढ़ाई की ताकि समाज की सेवा कर सकें। आज हमारे पास एमडी-एमएस की स्पेशलिस्ट डिग्री है, लेकिन हाथ में मूल दस्तावेज न होने के कारण हम किसी भी प्राइवेट अस्पताल में नौकरी के योग्य नहीं माने जा रहे हैं। हम अपने ही देश में बेरोजगार अपराधियों की तरह जीने को मजबूर हैं।”
पीएमओ का दखल: केंद्रीय बैंकों की शिकायत के बाद एक्शन में केंद्र
जब राज्य स्तर पर मंत्रियों और नौकरशाहों के चक्कर काटने के बाद भी इन डॉक्टरों की सुनवाई नहीं हुई, तो पीड़ित एसोसिएशन ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्रालय को अपनी आपबीती भेजी। चूंकि इसमें बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) और नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत डॉक्टरों की कमी का मुद्दा भी जुड़ा था, इसलिए पीएमओ ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है।
पीएमओ द्वारा भेजे गए नोटिस के बाद भोपाल के प्रशासनिक गलियारों (मंत्रालय) में हड़कंप मच गया है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इन 86 डॉक्टरों के दस्तावेजों की स्क्रूटनी शुरू कर दी गई है। पीएमओ को भेजे जाने वाले जवाब में यह प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है कि जब तक विभाग इन्हें सरकारी नियुक्ति नहीं दे पाता, तब तक के लिए इन्हें ‘प्रोविजनल सर्टिफिकेट’ जारी कर दिया जाए, ताकि ये निजी तौर पर प्रैक्टिस कर अपना बैंक लोन चुका सकें।
