नासा की रिपोर्ट से मचा हड़कंप: बिहार-बंगाल का प्रदूषण काला कर रहा हिमालय, तेजी से पिघल रही ग्लेशियरों की बर्फ

दिनांक: 11 जून, 2026

नई दिल्ली: हाल ही में नासा (NASA) और कोलकाता के बोस इंस्टीट्यूट द्वारा जारी 25 वर्षों के सैटेलाइट डेटा पर आधारित एक शोध ने पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के बीच खलबली मचा दी है। इस अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि मैदानी इलाकों, विशेषकर बिहार और पश्चिम बंगाल का जानलेवा प्रदूषण अब हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंच गया है, जिससे वहां के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

क्या है शोध का मुख्य निष्कर्ष?

वर्ष 2000 से 2024 तक के डेटा का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया है कि सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में पार्टिकुलेट मैटर (PM) प्रदूषण में 20% से अधिक की वृद्धि हुई है। शोध के अनुसार:

  • प्रदूषण के हॉटस्पॉट: बिहार और पश्चिम बंगाल वर्तमान में देश के सबसे बड़े ‘प्रदूषण हॉटस्पॉट’ बन चुके हैं। एयरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) इंडेक्स में इनका स्कोर क्रमशः 0.71 और 0.70 दर्ज किया गया है, जो बेहद चिंताजनक है।
  • ग्लेशियरों पर संकट: वाहनों, फैक्ट्रियों, कोयला जलाने और ईंट भट्टों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन और सल्फेट के कण हवा के जरिए हिमालय तक पहुंच रहे हैं। ये कण बर्फ की सफेद सतह पर गिरकर उसे काला कर रहे हैं। काली सतह अधिक गर्मी सोखती है, जिससे ग्लेशियरों के पिघलने की दर कई गुना बढ़ गई है।

प्रदूषण का ‘ट्रैजेक्टरी पाथ’

वैज्ञानिकों ने ‘बैकवर्ड ट्रैजेक्टरी मॉडलिंग’ के जरिए यह पता लगाया है कि यह प्रदूषण हिमालय तक कैसे पहुंचता है:

  • पश्चिमी और मध्य हिमालय: पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का उत्सर्जन यहां की हवा को प्रदूषित कर रहा है।
  • पूर्वी हिमालय: बिहार और पश्चिम बंगाल से उठने वाला जहरीला धुआं सीधे पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है।

क्यों बढ़ रहा है प्रदूषण?

शोध में यह भी सामने आया है कि प्रदूषण का कारण केवल उद्योग या वाहन नहीं हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ‘बायोमास’ (जैसे- फसल अवशेष, लकड़ी और कचरा) जलाने की घटनाओं में 50% तक का इजाफा हुआ है। जानकारों का कहना है कि भारत का ‘नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम’ (NCAP) मुख्य रूप से शहरों पर केंद्रित है, जबकि ग्रामीण इलाकों से होने वाले उत्सर्जन पर कोई नियंत्रण नहीं है, जो अब हिमालय जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम के लिए घातक साबित हो रहा है।

आगे का खतरा

मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि ग्लेशियर इसी तरह पिघलते रहे, तो आने वाले समय में बाढ़, अचानक आने वाली जलप्रलय (फ्लैश फ्लड्स) और जल संकट जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं भारत और पड़ोसी देशों के लिए एक ‘नेशनल इमरजेंसी’ का रूप ले सकती हैं। कोसी जैसी नदियों का प्रवाह अनिश्चित हो सकता है, जिससे तटीय और मैदानी इलाकों में तबाही का खतरा बढ़ जाएगा।

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NASA की रिपोर्ट: हिमालय के लिए खतरा बना बिहार-बंगाल का प्रदूषण

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