सुबह की हल्की धूप अरावली की नीची-ऊँची ढलानों पर फैल रही है.
कहीं ये पहाड़ रास्तों के साथ-साथ चलते नज़र आते हैं, कहीं अचानक किसी गाँव के पीछे दीवार की तरह खड़े हो जाते हैं.
कहीं इनकी हरियाली आँखों को सुकून देती है, तो कहीं खनन से बने गहरे गड्ढे डर पैदा करते हैं.
ये अरावली की पहाड़ियाँ हैं, दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक.
भूवैज्ञानिक बताते हैं कि ये पहाड़ हज़ारों साल पुराने हैं. लेकिन आज इनका इतिहास नहीं, भविष्य सवालों में है.
गुजरात से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली अरावली सिर्फ़ एक भौगोलिक संरचना नहीं है.
यह उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल है, रेगिस्तान को आगे बढ़ने से बांधने वाली, ज़मीन के भीतर पानी को थामे रखने वाली और हवा में उड़ने वाली धूल को रोकने वाली.
लेकिन आज यही अरावली क़ानूनी विवाद, खनन पट्टों और विकास बनाम संरक्षण की बहस के केंद्र में खड़ी है.
क़ानून की बहस और ज़मीन की हक़ीक़त

हाल के महीनों में अरावली उस वक्त सुर्ख़ियों में आई, जब सुप्रीम कोर्ट ने इसकी एक नई परिभाषा को मंज़ूरी दी.
इस परिभाषा के तहत केवल 100 मीटर या उससे ऊँची चोटियों को ही अरावली माना गया.
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और स्थानीय समुदायों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई. विरोध प्रदर्शन हुए, सोशल मीडिया पर अभियान चला, अरावली के महत्व पर गंभीर चर्चा हुई.
पर्यावरणविदों का तर्क था कि अरावली को केवल ऊँचाई से नहीं मापा जा सकता. यह पहाड़ ज़मीन के नीचे फैले अपने जलभृतों, जंगलों और पारिस्थितिकी तंत्र के कारण अहम है.
विरोध के बाद अदालत ने अपने इस आदेश पर फ़िलहाल रोक लगा दी है. अदालत ने अरावली से जुड़े मुद्दों की गंभीर समीक्षा पर ज़ोर दिया है और एक नई उच्च स्तरीय समिति के गठन की सिफ़ारिश की है.
लेकिन क़ानून की यह बहस जितनी दिल्ली और अदालतों में दिखती है, उससे कहीं ज़्यादा इसके प्रभाव राजस्थान के गाँवों में महसूस किए जा रहे हैं.

