दिनांक: 5 जून, 2026
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पार्टी के भीतर मची रार महज अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि इसे तृणमूल में ‘उत्तराधिकार की लड़ाई’ के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि इस बगावत की असली वजह कौन है—पार्टी की सुप्रीमो ममता बनर्जी का कठोर नियंत्रण या उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा?
ममता बनाम अभिषेक: दो ध्रुवों में बंटी पार्टी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी अब दो वैचारिक ध्रुवों में बंट गई है। एक ओर ममता बनर्जी का ‘पुराना गार्ड’ है, जो ममता की कार्यशैली और जमीनी राजनीति पर भरोसा करता है। दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में एक युवा खेमा है, जो पार्टी को कॉरपोरेट स्टाइल में चलाना चाहता है और ममता की छाया से बाहर निकलकर अपनी नई पहचान बनाना चाहता है।
बागी विधायकों का एक बड़ा धड़ा, जो ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में खड़ा है, यह मानता है कि पार्टी में अब नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा रहा है। जानकारों का कहना है कि अभिषेक बनर्जी के समर्थकों का बढ़ता प्रभाव ममता बनर्जी के उन वफादारों को चुभ रहा है, जो दशकों से ममता के साथ जुड़े हैं।
क्या है बगावत की असली वजह?
पार्टी में बढ़ती फूट के पीछे कई बड़े कारण बताए जा रहे हैं:
- नेतृत्व का एकाधिकार: बागी विधायकों का आरोप है कि पार्टी में हर फैसला सिर्फ ममता बनर्जी के इर्द-गिर्द घूमता है, जिससे विधायकों की अपनी कोई आवाज़ नहीं बची है।
- अभिषेक की कॉरपोरेट राजनीति: पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी द्वारा लाई गई नई कार्यप्रणाली को ‘पुराने नेताओं’ ने अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान लिया है।
- विधानसभा में उपेक्षा: ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में आगे करने की कोशिश यह दर्शाती है कि बागी विधायक अब पार्टी नेतृत्व को सीधी चुनौती देने के मूड में हैं।
ममता के लिए अग्निपरीक्षा
ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति किसी बड़े संकट से कम नहीं है। यदि 50 विधायकों का यह बागी गुट अलग स्टैंड लेता है, तो सरकार के बहुमत पर खतरा मंडरा सकता है। ममता बनर्जी ने फिलहाल ‘डैमेज कंट्रोल’ शुरू कर दिया है और अपने वरिष्ठ सहयोगियों को बागी विधायकों से बातचीत करने के लिए कहा है।
राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. सुमित घोष कहते हैं, “तृणमूल में यह लड़ाई केवल सीटों की नहीं है, यह लड़ाई ममता के बाद ‘वारिस’ तय करने की है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि पार्टी का असली कमान किसके हाथ में होगी, तब तक यह असंतोष खत्म होना मुश्किल है।”
भविष्य की राजनीति
इधर, विपक्ष इस मौके को भुनाने की पूरी कोशिश कर रहा है। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इस घटनाक्रम को ‘तृणमूल का पतन’ करार दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि ममता बनर्जी अपने पुराने वफादारों को संभाल पाती हैं या अभिषेक बनर्जी के साथ मिलकर पार्टी में एक नया बदलाव लाएंगी।
फिलहाल, कोलकाता की राजनीति में शांति से पहले का तूफ़ान है। सबकी नजरें 6 जून को होने वाली पार्टी की अहम बैठक पर टिकी हैं, जहाँ से भविष्य की तस्वीर साफ हो सकती है।
