अरावली की पहाड़ियां हर दिन मशीनों के नीचे दम तोड़ रही हैं, लेकिन विडंबना देखिए—यहाँ के पत्थरों से आलीशान इमारतें खड़ी हो रही हैं, जबकि स्थानीय लोगों के लिए दुखों का पहाड़ बढ़ता जा रहा है।”
सुबह की हल्की धूप अरावली की नीची-ऊँची ढलानों पर फैल रही है.
कहीं ये पहाड़ रास्तों के साथ-साथ चलते नज़र आते हैं, कहीं अचानक किसी गाँव के पीछे दीवार की तरह खड़े हो जाते हैं.
कहीं इनकी हरियाली आँखों को सुकून देती है, तो कहीं खनन से बने गहरे गड्ढे डर पैदा करते हैं.
ये अरावली की पहाड़ियाँ हैं, दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक.
भूवैज्ञानिक बताते हैं कि ये पहाड़ हज़ारों साल पुराने हैं. लेकिन आज इनका इतिहास नहीं, भविष्य सवालों में है.
गुजरात से राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली अरावली सिर्फ़ एक भौगोलिक संरचना नहीं है.
यह उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल है, रेगिस्तान को आगे बढ़ने से बांधने वाली, ज़मीन के भीतर पानी को थामे रखने वाली और हवा में उड़ने वाली धूल को रोकने वाली.
लेकिन आज यही अरावली क़ानूनी विवाद, खनन पट्टों और विकास बनाम संरक्षण की बहस के केंद्र में खड़ी है.

