22 मार्च 2026
कर्नाटक के ऐतिहासिक शहर हम्पी में स्थित विरुपाक्ष मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। इस मंदिर में मौजूद लगभग 1400 साल पुरानी वास्तुकला का अद्भुत नमूना हाल ही में सोशल मीडिया पर सुर्खियों में आया, जिसे देखकर उद्योगपति आनंद महिंद्रा भी हैरान रह गए।
दरअसल मंदिर के अंदर एक विशेष कक्ष में दीवार पर बना छोटा सा छेद प्राकृतिक “कैमरा ऑब्स्क्यूरा” (पिनहोल कैमरा प्रभाव) की तरह काम करता है। इस छोटे से छेद से गुजरने वाली सूर्य की रोशनी मंदिर के मुख्य राजा गोपुरम की उलटी और रंगों के साथ स्पष्ट छवि को अंदर की दीवार पर प्रोजेक्ट कर देती है।
प्राकृतिक पिनहोल कैमरे का अद्भुत उदाहरण
मंदिर के एक अंधेरे कक्ष में दीवार पर बना यह छोटा छेद सूर्य की रोशनी को अंदर आने देता है। जब यह रोशनी बाहर स्थित राजा गोपुरम से परावर्तित होकर अंदर प्रवेश करती है, तो सामने की दीवार पर गोपुरम की उलटी (इनवर्टेड) और वास्तविक समय की छवि दिखाई देती है।
यह प्रक्रिया बिल्कुल उसी सिद्धांत पर काम करती है जिस पर आधुनिक पिनहोल कैमरा आधारित होता है, हालांकि इसमें किसी प्रकार के लेंस का उपयोग नहीं किया गया है।
दोपहर में सबसे स्पष्ट दिखाई देती है छवि
जानकारों के अनुसार यह अद्भुत दृश्य विशेष रूप से दोपहर 2 बजे से शाम 6 बजे के बीच सबसे स्पष्ट दिखाई देता है। इस समय सूर्य की रोशनी सीधे मुख्य गोपुरम पर पड़ती है, जिससे अंदर दीवार पर बनने वाली छवि और अधिक साफ दिखाई देती है।
वास्तविक समय में दिखती है गतिविधि
इस प्राकृतिक प्रोजेक्शन की खास बात यह है कि यह लाइव छवि होती है। यदि बाहर बादल गुजरते हैं या लोग गोपुरम के सामने से चलते हैं, तो उनकी गतिविधियां भी अंदर दीवार पर उलटी दिखाई देती हैं।
मंदिर के भीतर विशेष कक्ष में मौजूद यह संरचना
यह अनोखा दृश्य मंदिर परिसर के एक अंधेरे बंद कक्ष में देखा जा सकता है, जो मंदिर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित माना जाता है। यह स्थान देवी के कक्ष के पास बताया जाता है, जहां यह प्राकृतिक प्रोजेक्शन दिखाई देता है।
विजयनगर काल की वैज्ञानिक समझ का उदाहरण
इतिहासकारों के अनुसार यह तकनीक विजयनगर साम्राज्य के समय या उससे भी पहले विकसित की गई थी। माना जाता है कि 7वीं से 15वीं शताब्दी के बीच मंदिर की वास्तुकला में विज्ञान और प्रकाश के सिद्धांतों का अद्भुत प्रयोग किया गया था।
इस तकनीक में बिना किसी आधुनिक उपकरण के प्रकाश और ऑप्टिक्स के सिद्धांतों का इस्तेमाल किया गया है, जो उस समय की वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है।
आनंद महिंद्रा ने जताया आश्चर्य
इस अनोखी संरचना का वीडियो और जानकारी सामने आने के बाद उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस प्राचीन तकनीक को देखकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि भारत की प्राचीन वास्तुकला में विज्ञान और कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
विज्ञान और आस्था का अनोखा संगम
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारतीय वास्तुकारों को प्रकाश, छाया और ऑप्टिक्स के सिद्धांतों की गहरी समझ थी। उन्होंने इन वैज्ञानिक सिद्धांतों को धार्मिक वास्तुकला के साथ इस तरह जोड़ा कि मंदिर स्वयं एक प्राकृतिक प्रोजेक्टर की तरह काम करने लगा।
निष्कर्ष: हम्पी का विरुपाक्ष मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह प्राचीन भारत की वैज्ञानिक और वास्तुकला संबंधी प्रतिभा का भी शानदार उदाहरण है। 1400 साल पुरानी यह पिनहोल कैमरा तकनीक आज भी लोगों को हैरान कर देती है और बताती है कि उस समय के वास्तुकार कितने उन्नत ज्ञान रखते थे।

