अकोला | 13 अक्टूबर 2026
महाराष्ट्र के अकोला शहर में स्थित प्राचीन अंबिका देवी मंदिर अपनी ऐतिहासिक कहानी और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय लोग इसे ‘रिजर्व माता मंदिर’ और ‘बागातली देवी’ के नाम से भी जानते हैं। मान्यता है कि यह मंदिर 300 साल से अधिक पुराना है। नवरात्रि के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और माता के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी ब्रिटिश शासनकाल की है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अंग्रेज अधिकारियों ने वर्ष 1853 के आसपास मंदिर की जगह पुलिस स्टेशन बनाने की योजना बनाई थी। इसके लिए परिसर को खाली कराने और जगह को आरक्षित करने की कोशिश की गई, लेकिन मंदिर वहां बना रहा। इसी घटना से जुड़ी मान्यता के कारण देवी को ‘रिजर्व माता’ कहा जाने लगा।
300 साल पुराना बताया जाता है मंदिर
अकोला के मध्य क्षेत्र में स्थित अंबिका देवी मंदिर लंबे समय से स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। मंदिर की स्थापना की सटीक तारीख उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय परंपरा में इसे कई शताब्दियों पुराना बताया जाता है।
मंदिर से जुड़ी एक मान्यता के अनुसार, पहले यहां फूलों का बगीचा हुआ करता था और उसी क्षेत्र में देवी की प्रतिमा स्थापित थी। इसी वजह से माता को ‘बागातली देवी’ नाम से भी पुकारा जाने लगा। समय के साथ यह स्थान पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजनों का प्रमुख केंद्र बन गया।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा की जाती है। श्रद्धालु नारियल, फूल, हल्दी, धूप, दीप और चुनरी अर्पित कर माता का आशीर्वाद मांगते हैं। स्थानीय लोगों के अलावा दूसरे शहरों से भी भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कैसे पड़ा ‘रिजर्व माता’ नाम?
मंदिर की पहचान से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी ब्रिटिश शासनकाल की है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, वर्ष 1853 में अंग्रेज अधिकारियों ने मंदिर परिसर में पुलिस स्टेशन बनाने की योजना तैयार की थी। इसके लिए उस जगह को आरक्षित करने और मंदिर को हटाने की कोशिश की गई।
कहा जाता है कि कई प्रयासों के बावजूद वहां पुलिस स्टेशन नहीं बन सका। इसके बाद स्थानीय लोगों ने इस घटना को माता की कृपा और चमत्कार से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे देवी को ‘रिजर्व माता’ के नाम से पुकारा जाने लगा।
यह कहानी स्थानीय धार्मिक परंपरा और जनश्रुति के रूप में प्रचलित है। मंदिर को हटाने के प्रयासों और पुलिस स्टेशन की योजना से संबंधित सभी घटनाओं की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
मंदिर हटाने के प्रयास से जुड़ी एक और मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक अन्य स्थानीय कथा में बताया जाता है कि जब अंग्रेज अधिकारी मंदिर को हटाने पहुंचे, उसी दौरान उनके परिवार के कुछ सदस्य बीमार पड़ गए। मान्यता के अनुसार, मंदिर की पुजारिन ने अधिकारी से मंदिर हटाने का काम रोकने के लिए कहा था। बाद में मंदिर को हटाने का फैसला वापस ले लिया गया।
श्रद्धालु इस घटना को माता की शक्ति से जोड़कर देखते हैं। हालांकि, यह प्रसंग भी स्थानीय रूप से प्रचलित कथा है और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय धार्मिक मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नवरात्रि में उमड़ती है भक्तों की भीड़
शारदीय नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर को रोशनी और सजावट से आकर्षक बनाया जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में पूजा-पाठ, आरती और भोग की परंपरा निभाई जाती है।
भक्तों का विश्वास है कि मां अंबिका अपने दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देती हैं और कठिन परिस्थितियों में मनोबल बनाए रखने की प्रेरणा देती हैं। कई लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माता के दर्शन करते हैं।
नवरात्रि के दिनों में मंदिर का धार्मिक माहौल और श्रद्धालुओं की उपस्थिति इसे अकोला के प्रमुख आस्था स्थलों में शामिल करती है।
आस्था और इतिहास का अनूठा संगम
रिजर्व माता मंदिर की पहचान केवल इसकी प्राचीनता से नहीं, बल्कि इससे जुड़ी स्थानीय परंपराओं से भी बनी है। अंग्रेजों के समय मंदिर को हटाने की कोशिश और बाद में ‘रिजर्व माता’ नाम प्रचलित होने की कथा पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों से मंदिर की स्थापना की सटीक तारीख और ब्रिटिश काल की घटनाओं की पूरी पुष्टि नहीं होती, लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
