नेपाल हादसे के बाद हिमालय को बचाने की बड़ी मुहिम, हाई-रिस्क प्रोजेक्ट्स के लिए ‘नो-गो जोन’ और न्यायपूर्ण मुआवजे की मांग

नई दिल्ली/हिमालयी क्षेत्र, 7 सितंबर 2026: हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ते आपदा जोखिम के बीच 60 नागरिक संगठनों और सामाजिक समूहों के गठबंधन ‘People for Himalaya’ ने हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को संवेदनशील हिमालयी इलाकों से दूर रखने की मांग की है। गठबंधन ने कहा है कि ऊंचाई वाले और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों को बड़े बांधों तथा अन्य जोखिमपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ‘नो-गो जोन’ घोषित किया जाना चाहिए।

यह मांग 26 अगस्त 2026 को नेपाल में हुई जानलेवा ice-rock avalanche के बाद सामने आई है। नागरिक संगठनों का कहना है कि हिमालय पहले से ही भूगर्भीय रूप से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है और जलवायु परिवर्तन के कारण यहां आपदाओं की आवृत्ति तथा तीव्रता बढ़ रही है।

हिमालयी क्षेत्र के लिए बढ़ता खतरा

हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है। यहां ग्लेशियर, बर्फ से ढके क्षेत्र, ऊंची पर्वत चोटियां और बेहद सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र मौजूद हैं।

जलवायु परिवर्तन के साथ तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव तथा ग्लेशियरों और हिमनद क्षेत्रों में परिवर्तन से बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF जैसे जोखिम बढ़ रहे हैं।

ऐसे में नागरिक संगठनों का तर्क है कि संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले प्राकृतिक और जलवायु जोखिमों का व्यापक आकलन जरूरी है।

हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर पर रोक की मांग

People for Himalaya ने मांग की है कि ऊंचाई वाले और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्रों में हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्पष्ट नो-गो जोन तय किए जाएं।

इसमें विशेष रूप से संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्रों और क्रायोस्फीयर यानी बर्फ एवं हिम से जुड़े क्षेत्रों में बड़े बांधों तथा अन्य बड़े बुनियादी ढांचे पर रोक लगाने की मांग शामिल है।

गठबंधन का कहना है कि इन क्षेत्रों में किसी परियोजना का जोखिम केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक घटना से कई तरह के cascading impacts पैदा हो सकते हैं।

हिमालयी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग पर जोर

संगठनों ने हिमालयी देशों और राज्यों के बीच मजबूत क्षेत्रीय सहयोग की भी मांग की है।

उनके मुताबिक, हिमालय से जुड़े कई जल संसाधन, नदियां और आपदा जोखिम सीमाओं से आगे तक फैले हैं। इसलिए किसी एक देश द्वारा अकेले आपदा प्रबंधन करना पर्याप्त नहीं होगा।

गठबंधन ने ट्रांसबाउंड्री डेटा शेयरिंग, संसाधनों की जानकारी साझा करने और आपदा के समय एक-दूसरे की मदद के लिए पारदर्शी तंत्र बनाने पर जोर दिया है।

शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत

हिमालयी आपदाओं को कम करने के लिए Early Warning Systems को मजबूत करना भी मांगों में शामिल है।

संगठनों का कहना है कि केवल आधुनिक तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ स्थानीय समुदायों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को भी शामिल किया जाना चाहिए।

रियल-टाइम मॉनिटरिंग, पुराने आपदाओं के अनुभव और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी को मिलाकर चेतावनी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी

गठबंधन ने कहा है कि आपदा के बाद राहत और पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया में प्रभावित लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

उनके मुताबिक, पुनर्निर्माण, जमीन, आजीविका और भविष्य की योजनाओं से जुड़े फैसलों में स्थानीय समुदायों को meaningful decision-making power मिलनी चाहिए।

इसका उद्देश्य केवल तत्काल राहत देने के बजाय प्रभावित लोगों की दीर्घकालिक आजीविका और सामाजिक सुरक्षा को बहाल करना है।

न्यायपूर्ण मुआवजे की मांग

इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण मांगों में जलवायु नुकसान और क्षति के लिए सीधे मुआवजे की व्यवस्था शामिल है।

People for Himalaya का कहना है कि हिमालयी आपदाओं को केवल प्राकृतिक आपदा या मानवीय सहायता की जरूरत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को Climate Liability के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।

गठबंधन ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त ऐसा ढांचा बनाने की मांग की है, जिसके तहत जलवायु से होने वाले नुकसान और क्षति के लिए प्रभावित समुदायों को प्रत्यक्ष मुआवजा मिल सके।

पर्यटन और शहरीकरण को नियंत्रित करने की मांग

सिर्फ बड़े बांधों और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर ही सवाल नहीं उठाया गया है। संगठनों ने हिमालय में बढ़ते पर्यटन और शहरीकरण को भी पर्यावरणीय सीमाओं के भीतर रखने की मांग की है।

इसके लिए स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर Land Use Planning और विकास की स्पष्ट सीमाएं तय करने की बात कही गई है।

गठबंधन का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक क्षमता से अधिक दबाव डालने वाले निर्माण और पर्यटन मॉडल भविष्य में आपदा जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा भी मुद्दा

हिमालयी क्षेत्रों में सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और निर्माण कार्यों में लगे श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई है।

संगठनों ने हाई-रिस्क परियोजनाओं में अनिवार्य जोखिम आकलन, Emergency Preparedness, Evacuation Protocols, Communication Systems और सुरक्षित कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित करने की मांग की है।

इसमें प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा को भी विशेष महत्व देने की बात कही गई है।

नेपाल हादसे ने फिर बढ़ाई चिंता

26 अगस्त को नेपाल में हुई ice-rock avalanche के बाद हिमालयी क्षेत्र में आपदा जोखिम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आया है।

इस घटना के संदर्भ में नागरिक संगठनों का कहना है कि हिमालय में होने वाली प्रत्येक बड़ी आपदा को अलग-अलग और असाधारण घटना मानने के बजाय क्षेत्र में बढ़ते जोखिम के व्यापक पैटर्न के रूप में देखना जरूरी है।

भारत में भी GLOF और हिमस्खलन की तैयारी पर जोर

इसी बीच भारत सरकार भी हिमालयी राज्यों में GLOF और हिमस्खलन के जोखिम को लेकर तैयारियों की समीक्षा कर चुकी है।

3 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह सचिव ने नई दिल्ली में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की तैयारियों की समीक्षा की थी। बैठक में ग्लेशियल झीलों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी, जोखिम वाले स्थानों की पहचान, निकासी व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर तैयारी मजबूत करने पर जोर दिया गया था।

सिर्फ राहत नहीं, जोखिम कम करने पर जोर

नागरिक संगठनों का कहना है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी आपदाओं के जोखिम को पहले से कम किया जाए।

इसके लिए विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय जोखिम, ग्लेशियर और स्थानीय पारिस्थितिकी को प्राथमिकता देने की जरूरत है।

हिमालय के लिए नए विकास मॉडल की मांग

People for Himalaya का संदेश है कि हिमालय में विकास की प्रक्रिया स्थानीय पर्यावरणीय सीमाओं और समुदायों की जरूरतों के अनुरूप होनी चाहिए।

बड़े बांध, सुरंग, सड़क, पर्यटन परियोजनाएं और शहरी विस्तार शुरू करने से पहले यह देखना जरूरी है कि क्षेत्र उनकी पर्यावरणीय और भूगर्भीय लागत वहन करने की स्थिति में है या नहीं।

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