दिनांक: 20 जून, 2026
आध्यात्मिक डेस्क, उज्जैन:
जीवन में सुख और शांति की तलाश कर रहे इंसानों के लिए संतों और महापुरुषों के विचार हमेशा से मार्गदर्शक रहे हैं। वर्तमान समय की भागदौड़ और मानसिक तनाव के बीच, एक प्रसिद्ध संत ने अपने आश्रम में पहुंचे एक अत्यंत दुखी और परेशान व्यक्ति को जीवन का सबसे अनमोल मूलमंत्र दिया है। संत ने स्पष्ट किया कि जब तक मनुष्य अपने अतीत के बोझ, पुरानी गलतियों और बीते समय में हुए नुकसान का शोक मनाना नहीं छोड़ेगा, तब तक उसे वर्तमान में कभी भी शांति और आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती।
आश्रम पहुंचा था अवसाद से घिरा व्यक्ति
मिली जानकारी के अनुसार, एक संभ्रांत परिवार का व्यक्ति अपने व्यापार में हुए भारी वित्तीय नुकसान और पारिवारिक कलह के कारण गहरे अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रहा था। वह शांति की तलाश में धर्मनगरी के एक विख्यात संत के आश्रम में मार्गदर्शन के लिए पहुंचा। उसने संत के समक्ष अपना दुख रोते हुए कहा, “महाराज, मुझसे अतीत में कुछ ऐसी गलतियां हुईं, जिनके कारण मेरा भारी नुकसान हो गया। मैं चौबीसों घंटे उसी नुकसान और अपनी गलतियों के बारे में सोचता रहता हूँ। मुझे न रात को नींद आती है और न मन को कहीं चैन मिलता है।”
संत ने दिया ‘रेत और मुट्ठी’ का जीवंत उदाहरण
व्याकुल व्यक्ति की बात को शांत भाव से सुनने के बाद, संत ने उसे जमीन से एक मुट्ठी सूखी रेत उठाने को कहा। जब व्यक्ति ने मुट्ठी में रेत भर ली, तो संत ने कहा, “अब इस मुट्ठी को और कसकर भींचो।” व्यक्ति ने जैसे ही मुट्ठी कसी, रेत उसकी उंगलियों के बीच से फिसलकर नीचे गिरने लगी।
संत ने मुस्कुराते हुए उसे सीख दी:
“यह रेत तुम्हारा बीता हुआ समय और तुम्हारा नुकसान है। तुम जितना अधिक इसे कसकर पकड़ने की या इसके बारे में सोचने की कोशिश करोगे, यह उतना ही तुम्हारे वर्तमान को खाली करती जाएगी। जो समय बीत गया, उस पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं है। अपनी पुरानी गलतियों से केवल सीख लो, उन्हें अपने आज का बोझ मत बनाओ। जब तक तुम पुरानी असफलताओं के मलबे को दिमाग से साफ नहीं करोगे, तब तक नए और सुखद विचारों के लिए जगह कैसे बनेगी?”
चिंता और चिंतन में अंतर समझें: तभी मिलेगा सुख
संत ने सत्संग में आए अन्य श्रद्धालुओं को भी संबोधित करते हुए कहा कि आज 90 प्रतिशत लोग ‘चिंता’ में जी रहे हैं, जबकि आवश्यकता ‘चिंतन’ की है।
- चिंता से नुकसान: बीती बातों की लगातार चिंता करने से मानसिक स्वास्थ्य तो खराब होता ही है, साथ ही मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता भी कमजोर हो जाती है।
- सुख का एकमात्र मार्ग: जीवन में सुख-शांति का केवल एक ही रास्ता है—वर्तमान क्षण को स्वीकार करना, बीते कल के नुकसान को भूलकर आगे बढ़ना और एक नई सुबह के साथ नई शुरुआत करना।
संत के इन तार्किक और करुणामय शब्दों को सुनकर दुखी व्यक्ति का मानसिक बोझ हल्का हो गया। उसने अपनी गलतियों की आत्मग्लानि को पीछे छोड़कर नए उत्साह के साथ जीवन जीने का संकल्प लिया।
